प्रथम हरियाणा रंग उत्सव के अंतिम दिन एकल नाट्य प्रस्तुति ऑडिशन का मंचन किया गया, जिसका लेखन और निर्देशन प्रो. रवि चतुर्वेदी द्वारा किया गया ।
फोर्थ वाल प्रोडक्शंस और बैठानिया सेंटर के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह की अंतिम प्रस्तुति में मुख्य पात्र अंशु करंजकर एक छोटे से शहर से नाट्य प्रशिक्षण प्राप्त कर इनटर्नशिप के लिए मुंबई आ जाती है और उसके बाद शुरू होता है ऑडिशन का एक अंतहीन सिलसिला। संघर्षरत अभिनेताओं के लिए तो ये एक त्रासद अनुभव होता ही है। अंशु एक प्रेक्षागृह में ऑडिशन देने जाती है जिसका मुख्य द्वार दुर्घटनावश (या प्रतिकात्मक अर्थ के साथ) बाहर से बंद हो जाता है। खाली प्रेक्षागृह में मंच पर पूर्व में किए कुछ नाटकों की प्रोप्स पड़ी दिखलाई देती हैं। अंशु उन प्रोप्स के साथ अलग अलग नाटकों के कुछ दृश्य प्रस्तुत करती है और अपने जीवन संघर्ष और थिएटर के कड़वे – मीठे अनुभव प्रस्तुत करती है। परंतु प्रेक्षागृह का बंद द्वार उसे बाहरी दुनिया से बिलकुल अलग कर देता है। रंगमंच और उसके काल्पनिक जगत मे भटकती हुई उसकी ज़िंदगी अभिनय में ही विलीन हो जाती है। दर्शकों के अभाव में अभिनेता की ज़िंदगी एक शून्य से अधिक से नहीं होती। अपनी रंग-यात्रा के दौरान ही अभिनेता को इस बात का एहसास होने लगता है कि शून्य का सृजन ही सृजन का शून्य होता है। शून्यवादी चक्र उसकी ज़िंदगी के मकसद को पुनः उसी बिन्दु पर लाकर छोड़ देता है जहां से वो चला था। ऑडिशन लगभग एक घंटे की एकल प्रस्तुति है जिसे एक नितांत नयी अभिनेत्री ने बहुत ही कुशलता के साथ प्रस्तुत किया। नाटक में आस्था सेठी द्वारा अभिनय किया गया । नाटक में पार्श्व मंच में संगीत व्यवस्था दिव्यांशु गुप्ता और प्रकाश व्यवस्था डा. देशराज ने की।