. 🏵 “अहोई अष्टमी व्रत” 🏵
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई का व्रत रखा जाएगा और यह तिथि 17 अक्टूबर 2022 को सुबह 9 बजकर 29 मिनट से शुरू होगी और 18 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर इसका समापन होगा। अहोई अष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त 17 अक्टूबर को शाम 06 बजकर 14 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। अहोई अष्टमी में शाम की पूजा और तारों को करवे से अर्ध्य देने का महत्व है। ऐसे में अहोई अष्टमी व्रत 17 अक्टूबर दिन सोमवार को रखा जाएगा।
अहोई अष्टमी शुभ मुहूर्त :-
अष्टमी तिथि प्रारम्भ :-
17, 2022 को सुबह 09:29 बजे।
अष्टमी तिथि समाप्त :- अक्टूबर 18, 2022 को सुबह 11:57 बजे।
अहोई अष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त :-
तारों को देखने का समय शाम 06 बजकर 11 मिनट।
अहोई अष्टमी को चन्द्रोदय का समय रात 11 बजकर 58 मिनट।
पूजा का शुभ समय व मुहूर्त :-
शाम को 05 बजकर 39 से 06 बजकर 56 मिनट तक।
अहोई अष्टमी पर बनने वाले शुभ संयोग:-
अभिजीत मुहूर्त:-
दोपहर 12 बजे से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक।
अमृत काल:-
सुबह 02 बजकर 31, अक्टूबर 18 से, सुबह 04 बजकर 19 मिनट, अक्टूबर 18 तक ।
सर्वार्थ सिद्धि योग:-
सुबह 05 बजकर 13 मिनट, अक्टूबर 18 से सुबह 06 बजकर 33 मिनट, अक्टूबर 18 तक ।
शिव योग:-
17 अक्टूबर, प्रात:काल से लेकर शाम 04 बजकर 02 मिनट।
विजय मुहूर्त:-
शाम 5 बजकर 50 मिनट से लेकर 07 बजकर 05 मिनट तक।
पूजा की अवधि :-
01 घंटा 17 मिनट तक।
अहोई अष्टमी पूजा विधि :-
अहोई अष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लेना चाहिए। इसके दिन बाद दिनभर बिना कुछ खाए उपवास का पालन करना चाहिए। इसकी पूजा की तैयारी सूर्यास्त से पहले ही संपन्न की जाती है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले दीवार पर अहोई माता का फोटो लगाया जाता है। अहोई माता का चित्र अष्ट कोष्टक होगा, तो बेहतर रहेगा। उसमें साही (पर्क्यूपाइन) या अथवा उसके बच्चे का चित्र में अंकित करना चाहिए। उसके बाद लकड़ी की एक चौकी सजाना चाहिए, और माता के चित्र की बायी तरफ पवित्र जल से भरा हुए कलश रखा जाना चाहिए। कलश पर स्वस्तिक का चिह्न बनाकर मोली अवश्य बांध दें। इसके बाद दीपक अगरबत्ती आदि लगाकर माता को पूरी, हलवा तथा पुआ युक्त भोजन किया जाना चाहिए। इस भोजन को वायन भी कहा जाता है। इसके अलावा अनाज जैसे ज्वार अथवा कच्चा भोजन (सीधा) भी मां को पूजा में अर्पित किया जाना चाहिए। इसके बाद परिवार की सबसे बड़ी महिला सभी महिलाओं को इस व्रत की कथा का वाचन करना चाहिए। कथा सुनते समय याद रखें कि सभी महिलाएं अपने हाथ में अनाज के सात दाने रख लें। इसके बाद पूजा के अंत में अहोई अष्टमी आरती की जाती है। कुछ समुदायों में चाँदी की अहोई माता बनाई व पूजी जाती है। इसे स्याऊ भी कहते हैं। पूजा के बाद इसे धागे में गूंथ कर गले में माला की तरह पहना जाता है। पूजा सम्पन्न होने के बाद महिलाएं पवित्र कलश में से चंद्रमा अथवा तारों को अर्घ्य देती हैं, और उनके दर्शन के बाद ही अहोई माता का व्रत संपन्न होता है।
चांदी की अहोई :-
अहोई अष्टमी के दिन कई लोग चांदी की अहोई बनाकर पूजा करते है, जिसे बोलचाल की भाषा में स्याऊ कहते है। आप चांदी के दो मोती लेकर एक धागे में अहोई और दोनों चांदी के दानें डाल लें। इसके बाद इसकी माता अहोई के सामने रखकर रोली, चावल और दूध से पूजा करें। अहोई माता की कथा सुनने के बाद इस माला को अपने गले में पहनें। इसके बाद चंद्रमा या तारों को जल चढ़ाकर भोजन कर व्रत खोलें।
अहोई अष्टमी के दिन तारों को देखने का समय :-
जो माताएं तारों को देखकर पारण करती हैं। वो शाम के समय 6 बजकर 36 मिनट पर पारण कर सकती हैं। वहीं, जो महिलाएं चंद्रमा को देखकर पारण करती हैं वो रात 11 बजकर 24 मिनट के बाद पारण कर सकती हैं।
🚩 अहोई अष्टमी व्रत❓❓❓
व्रत परिचय :-
“अहोई” का अर्थ : “अ+ होई”
अर्थात् ‘जो कभी हुई ही नहीं’, यानि आम भाषा में कहें तो “अनहोनी”।
आधिकारिक नाम :
अहोई अष्टमी व्रत,
अनुयायी :
हिन्दू, भारतीय, भारतीय प्रवासी,
पर्व का प्रकार :
हिन्दू,
व्रत का उद्देश्य :
संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु,
तिथि :
कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी,
समान पर्व :
करवा चौथ, तीज और छठ ।
महत्वता :
अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। तारों को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवार पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवार पर टांग दिया जाता है।
होई के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। यह व्रत पुत्र की लम्बी आयु और सुखमय जीवन की कामना से पुत्रवती महिलाएं करती हैं। कृर्तिक मास की अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में यह व्रत रखा जाता है इसलिए इसे अहोई अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।
व्रत विधि :-
उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोईअष्टमी की दो लोक कथाएं प्रचलित हैं।
प्राचीन काल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ हो ली। साहुकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की खुप्रपी के चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।
स्याहू के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभीयों से एक एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।
सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं अचानक साहुकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है।
वहां स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहु होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहु का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है। अहोई का अर्थ एक प्रकार से यह भी होता है “अनहोनी को होनी बनाना” जैसे साहुकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था। अहोई व्रत का महात्मय जान लेने के बाद आइये अब जानें कि यह व्रत किस प्रकार किया जाता है।
नोट :-
अगर घर में कोई नया मेम्बर आता है, तो उसके नाम का अहोई माता का कैलंडर उस साल लगाना चाहिए। यह कैलंडर, जहाँ हमेशा का अहोई माता का कैलेंडर लगाया जाता है, उसके लेफ्ट में लगते हैं। जब बच्चा होता है, उसी साल कुण्डवारा भरा जाता है। कुण्डवारे में चौदह कटोरियाँ/ सर्रियाँ, एक लोटा, एक जोड़ी कपडे, एक रुमाल रखते हैं। हर कटोरी में चार बादाम और एक छुवारा (टोटल पांच) रखते हैं और लोटे में पांच बादाम, दो छुवारे और रुमाल रखकर पूजा करते हैं। यह सारा सामान ननद को जाता है।
अहोई व्रत से जुड़ी परम्परा :-
घर जाकर उन्हें लगता है कि इस तरह साही का शाप भी हो गया और उनकी ननद की गृहस्थी भी बच गई। लेकिन जिस भाभी ने अपनी कोख बंधवाई थी, कुछ ही दिन में उसके बच्चों की मृत्यु हो जाती है। वह एक ज्ञानी पंडित को बुलाकर इसका कारण पूछती है तो पंडित उसे सुरही गाय की सेवा करने के लिए कहते हैं। वह सुरही गाय की सेवा में पूरे मन से जुट जाती है। इससे खुश होकर सुरही गाय उसे साही के पास ले जाती है।
सुरही गाय साही से विनती करती है कि वह छोटी बहू को अपने शाप से मुक्त कर दे। साही को छोटी बहू के बच्चों की मृत्यु के बारे में सुनकर बहुत दुख होता है, साथ ही वह उसके द्वारा सुरही गाय की सेवा देखकर भी खुश होती है। इसके बाद साही छोटी बहू को अपने शाप से मुक्त कर देती है। फिर सुरही गाय और साही दोनों उसे सौभाग्यवती रहने और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं। इनके आशीर्वाद से छोटी बहू की सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं और उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है।
“अहोई माता की आरती” :-
“जय अहोई माता,
जय अहोई माता!
तुमको निसदिन ध्यावत,
हर विष्णु विधाता। टेक।।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला,
तू ही है जगमाता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता।। जय।।
माता रूप निरंजन,
सुख-सम्पत्ति दाता।।
जो कोई तुमको ध्यावत,
नित मंगल पाता।। जय।।
तू ही पाताल बसंती,
तू ही है शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक,
जगनिधि से त्राता।। जय।।
जिस घर थारो वासा,
वाहि में गुण आता।।
कर न सके सोई कर ले,
मन नहीं धड़काता।। जय।।
तुम बिन सुख न होवे,
न कोई पुत्र पाता।
खान-पान का वैभव,
तुम बिन नहीं आता।। जय।।
शुभ गुण सुंदर युक्ता,
क्षीर निधि जाता।
रतन चतुर्दश,
तोकू कोई नहीं पाता।।जय।।
श्री अहोई माँ की आरती,
जो कोई गाता।
उर उमंग अति उपजे,
पाप उतर जाता।। जय।।
जय अहोई माता,
जय अहोई माता।
तुमको निसदिन ध्यावत,
हर विष्णु विधाता” ।।
अहोई अष्टमी उद्यापन विधि :-
जिस स्त्री का पुत्र न हो अथवा उसके पुत्र का विवाह हुआ हो, उसे उद्यापन अवश्य करना चाहिए। इसके लिए एक थाल में सात जगह चार-चार पूरियां एवं हलवा रखना चाहिए। इसके साथ ही पीत वर्ण की पोशाक- साड़ी, ब्लाउज एवं रुपये आदि रखकर श्रद्धा पूर्वक अपनी सास को उपहार स्वरूप देना चाहिए। उसकी सास को चाहिए कि वस्त्रादि को अपने पास रखकर शेष सामग्री हलवा-पूरी आदि को अपने पास-पड़ोस में वितरित कर दे। यदि कोई कन्या हो तो उसके यहां भेज दे।
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लेख विशेष :-
*दास ने इस लेख को लोक किवदंती के आधार पर भारतीय रिति- रिवाज और परम्परा की जानकारी हेतु लिखा है । हमारे किसी भी वेद- पौराणिक ग्रंथों आदि में इस व्रत का जिक्र नहीं मिला ।
**संत मत के हिसाब से भी इस तरह के सभी व्रतों को कोई मान्यता नहीं है और ना ही साधक को इन व्रतों का विशेष लाभ प्राप्त होता है ।
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संग्रहकर्ता एवं लेखक…. ✍🏻
संतों के दास संतदास रत्तेवाल ।
संस्थापक : “समस्त भारतीय संत समाज” ©।
+91 8685858885
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