तेरा ही सहारा है सतगुरु,
तेरा ही सहारा है ।।टेक।।
तुम पास हो मेरे साहिब,
फिर भी मैं बिछुड़ गया हूँ ।
मोह माया ने ऐसा जकड़ा,
खुद से फिसल गया हूँ ।।१।।
विषय विकारों से थका हूँ,
सतगुरु वैराग मुझको देना ।
तेरे प्यार का हूँ मैं प्यासा,
अपना मुझको बना लेना ।।२।।
कैसे भला होगा मेरा,
स्वामी मैं नहीं जानता ।।
तेरी रजा में हे सतगुरु,
अपना जीवन मैं मानता।।३।।
मोह माया में मेरे सांईं ,
कहीं मैं भूल ना जाऊं ।
मझधार में डुब सकूं ना,
तेरी ऊंगली पकड़ तर जाऊं।।४।।
रंग में तेरे रंग गया दाता,
छोड़ दिया जग सारा ।
बन गया तेरे प्रेम का जोगी,
लेकर मन का इकतारा ।।५।।
संतदास भी तेरे चरणों में,
आस की ज्योत जगाए ।
दरश तेरा पाकर साहिब,
हम मुक्ति पद को पांए ।।६।।