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काली बर्फ़ ने दिखाई यकीन करने से सच बनने की हक़ीकत ।

फोर्थ वाॅल प्रोडक्शंस और अदाकार नाट्य अकादमी ने काली बर्फ़ – द डार्क वैली नाटक का मंचन किया। कश्मीर की समस्याओं के बीच सच और झूठ की परतों को खोलते इस नाटक को बैठानिया सेंटर में मंचित किया गया। केवल तीन पात्रों के सशक्त अभिनय ने कई वरिष्ठ रंगकर्मियों के साथ आम दर्शकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।

लोग मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों, गुरूद्वारों में जाने से सब ठीक हो जाने पर यकीन करते हैं, इसलिए वहां जाते हैं। अगर कोई रबड़ की गुड़िया में यकीन करे तो क्या वह भी हक़ीकत हो सकती है। हमारे यकीन करने से क्या सच अपने आप बन जाता है। इसी मुख्य संदेश को अपने में समेटे नाटक काली बर्फ़ – द डार्क वैली के मंचन ने दर्शकों को खूब झकझोरा। यह नाटक कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां अब्दुल अपनी बीवी के साथ खुशी-खुशी रहता है। जेहादियों द्वारा फेंके गए बम से अब्दुल के होने वाले बच्चे की मौत हो जाती है और अब्दुल की बीवी एक रबड़ की गुड़िया को ही अपना बेटा मानने लगती है। अपनी बीवी की यकीन को कायम रखने के लिए अब्दुल भी बच्चे के इलाज के लिए एक डाॅक्टर का ले आता है। अंत में डाॅक्टर भी उनके यकीन को जायज़ ठहराता है।

इस नाटक का निर्देशन सुभाष चंद्रा ने और डिज़ाइन दीपक पुष्पदीप ने किया। इसके साथ ही मुख्य पात्रों की भूमिका अंकुश शर्मा, रमन चंजोतरा और भारती यादव ने निभाई। वहीं नाटक में मंच परे की भूमिका के तहत संगीत संचालन अभिषेक राठौड, सेट और प्रापर्टीज इंचार्ज के तौर पर अभिषेक प्रिन्स और आकाश सेंगर ने किया।

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