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ग्रामीण संस्कृति को सहेज रहा है सूरजकुंड मेले में ‘अपणा घर’

अंग्रेजो के समय के पुराने बाट बने आकर्षण का केन्द्र

फरीदाबाद, 04 फरवरी।
अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड क्राफ्ट मेले में हरियाणा का ‘अपणा घर’ ग्रामीण संस्कृति को सहेज कर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। यहां पर प्रदर्शित 100 साल से अधिक पुरानी ग्रामीण जीवन की विषय-वस्तुएं सभी पर्यटकों के लिए कौतुहल का कारण बनी हुई हैं। अब तक विरासत दि हेरिटेज विलेज कुरुक्षेत्र द्वारा स्थापित किए गए ‘अपणा घर’ को लाखों लोग देख चुके हैं। यह जानकारी विरासत के संयोजक डॉ. महासिंह पूनिया ने दी।
उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री अमित अग्रवाल एवं निदेशक पार्थ गुप्ता के निर्देशन में इस वर्ष हरियाणा का ‘अपणा घर’ विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। यहां पर हरियाणा की पगड़ी के अलग-अलग स्वरूप देखने को मिलते हैं। इसके साथ ही ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी हुई 100 साल से अधिक पुरानी विषय-वस्तुए पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।
डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि यहां पर ऊंटों को बांधने के लिए 100 साल से अधिक पुराने तालों का सेक्शन जिसे न्यौल कहते हैं स्थापित किया गया है। पनघट पर प्रयोग किए जाने वाले डोल भी प्रदर्शनी में प्रदर्शित किए गए हैं। इसके साथ ही अनेक सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए हैं ताकि युवा पीढ़ी पगड़ी बंधवा कर सेल्फी खिंचवा सकें और हरियाणवी संस्कृति से जुड़ सके। घरों में दूध बिलोने के लिए प्रयोग की जाने वाली रईयों की विविधता भी यहां पर प्रदर्शित की गई है। इसके साथ ही हल के साथ प्रयोग किये जाने वाला तथा बीज बीजने में उपयोगी ओरणों का सेक्शन पर्यटकों के लिए प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने कहा कि कुएं में कोई वस्तु गिर जाने पर निकालने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कांटे व बिलाई नई पीढ़ी के लिए किसी अचंभे से कम नहीं है। अपणा घर में मुगल काल के 100 से अधिक ताले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। विरासत प्रदर्शनी में हरियाणा के गांवों से जुड़ी हुई अनेक प्राचीन वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है जो अब लुप्तप्राय हो चुकी हैं। विरासत हेरिटेज विलेज का प्रयास है कि अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए इन वस्तुओं को संजो कर रखा जा सके जिससे वे इनको देखकर इन पर गर्व कर सकें। यहां पर डायल का प्रदर्शन किया गया है। पुराने समय में इसके दोनों तरफ रस्सी बांधकर दो व्यक्ति तालाब में से ऊंची भूमि पर इससे पानी खींचने का काम किया करते थे। यहां पर प्रदर्शित जेली एवं टांगली किसान द्वारा बिखरी हुई फसल को एकत्रित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। यहां पर प्रदर्शित लकड़ी, लोहे व पीतल की घंटियां, बैलों, गाय, भैंसों, हाथी तथा रथ के लिए प्रयोग में लाई जाती रही हैं।
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 प्रदर्शनी में अंग्रेजों के आने से पहले देहात में अनाज तथा तेल आदि की मपाई के लिए जिन मापकों का प्रयोग किया जाता था उनका भी प्रदर्शन किया गया है। छटांक, पाव, सेर, दो सेर, धड़ी, मण इनके आकार के अनुसार अनाज को मापने के लिए प्रयोग किए जाते रहे हैं। यहां पर अंग्रेजों के समय में प्रयोग होने वाले बाटों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी में गांवों में महिलाओं द्वारा लडक़ी को दान में दिए जाने वाली फुलझड़ी को भी दिखाया गया है। इसी तरह से बोहिया भी देहात में प्रयोग होने वाली महत्वपूर्ण वस्तु है। यह कागज, मुलतानी मिट्टी को गलाकर बनाये जाने वाली वस्तु है। इसी प्रकार यहां पर प्रदर्शित खाट एवं पीढ़ा हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। पीढ़ा, खटौला, खाट, पिलंग, दैहला आदि घरों, बैठकों एवं चौपालों में प्रयोग किए जाते रहे हैं।

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