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बेटों का इंतज़ार मां-बाप को पड़ा भारी

पांचवे फ़रीदाबाद थियेटर फेस्टिवल के चौथे दिन मंचित हुआ नाटक संध्या छाया अपनी दो घंटे की लंबी प्रस्तुति के बावजूद दर्शकों को सोचने और झकझोरने में कामयाब रहा। फ़ोर्थ वाॅल प्रोडक्शंस द्वारा द कैसल ऑफ आर्ट थियेटर के सहयोग से आयोजित हो रहे इस फेस्टिवल का शुभारंभ रंगकर्मी सुंदर लाल छाबड़ा तथा नाट्य प्रेमी तनुज और जी के अरोड़ा ने दीप प्रज्वलित करके किया।

 

जयवंत दलवी द्वारा लिखित नाटक में बेटों के होते हुए संतान का अभाव झेलते वृद्ध मां-बाप की मार्मिक वेदना को दिखाया गया है। इस बात से अनभिज्ञ युवा पीढ़ी अपनी मौज में मस्त है और उन्हें अपने कैरियर के आगे कुछ दिखाई नहीं देता। इस नाटक की पटकथा में वृद्ध दंपत्ति के दो बेटे होने के बावजूद भी वह अकेले रहने को मजबूर हैं क्योंकि एक बेटा नौकरी करने के लिए अमेरिका जाकर वहीं शादी कर लेता है तो दूसरा कश्मीर में तैनात है। संतान के विरह को झेलने मां-बाप रांग नंबर वाली लड़की तथा घर पर ग़लती से दस्तक देने वाले लोगों से मीठे बोलों की उम्मीद में उनसे ही काफ़ी देर तक बातें करने लगते हैं। नाटक के बीच में ऐसे कई दृश्य आते हैं जो अकेले होने के दुख को दिखाते हैं। इस तरह यह नाटक कई सवाल पैदा करते हुए लोगों को सोचने पर विवश करने के साथ ख़त्म होता है।

 

सुनील चौहान द्वारा निर्देशित इस नाटक में संगीत अभ्युदय मिश्रा का था और मुख्य पात्रों में गौरी गुप्ता और मोहम्मद अकीब थे, जिन्होंने अपने शानदार अभिनय से दो घंटे की लंबी प्रस्तुति में भी दर्शकों को बांधे रखा। इनके साथ ही अकरम, आशीष, कार्तिक दास, मनीषा शर्मा, कार्तिक झरिया, तत्व आदि भी अन्य चरित्रों के किरदार में थे।

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