अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड मेला में एक स्टॉल ऐसी जहां लकड़ी पर होती है गजब की नक्काशी, मूर्तियां देख रह जाएंगे निहारते
अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड मेला में तिरुपति बालाजी से आए फूला चंदू ने लगाई हुई है वुड कार्विंग स्टॉल - हरियाणा प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों के हस्तशिल्प कलाकारों को भी बेहतरीन मंच प्रदान कर रहा है सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला

फरीदाबाद, 4 फरवरी।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के मार्गदर्शन व हरियाणा पर्यटन मंत्री डा. अरविंद शर्मा की देख-रेख में हरियाणा के जिला फरीदाबाद के सूरजकुंड में लोकल फॉर ग्लोबल-आत्मनिर्भर भारत की पहचान थीम के साथ आयोजित किया जा रहा 39वां सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला हरियाणा प्रदेश ही नहीं अपितु देश के अन्य राज्यों के हस्तशिल्पियों को भी अपनी हस्तकला का प्रदर्शन करने के लिए बेहतरीन मंच प्रदान कर रहा है। सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला में आए ऐसे ही एक हस्तशिल्पी हैं तिरुपति बालाजी से आए फूला चंदू। फूला चंदू सूरजकुंड मेला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वोकल फॉर लोक व आत्मनिर्भर भारत विजन को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। फूला चंदू को को लकड़ी पर नक्काशी करने में महारथ हासिल है, जिसके माध्यम से वे लकड़ी पर गजब की नक्काशी करते हैं और लकड़ी को भगवान की मूर्तियों का रूप देते हैं। फूला चंदू द्वारा लगाई गई स्टॉल दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने के साथ-साथ लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
फूला चंदू ने बताया कि लकड़ी से मूर्तियां बनाने की कला को वुड कार्विंग कहा जाता है। उन्होंने गेट नंबर 3 पर फूला वुड कार्विंग के नाम से शॉप लगाई हुई है, जिसका नंबर 1284 है। वे काफी समय से इस काम को कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मूर्तियां व अन्य सामान बेशक लकड़ी से बनाया जाता हैं लेकिन ये सालों तक चलती है और इनकी चमक भी सालों-साल बरकरार रहती है। मूर्तियां बनाने में संगवान, महागनी आदि लकडिय़ों का प्रयोग किया जाता है। नक्काशी से लकड़ी पर तराशे गए भगवान श्री गणेश, भगवान बुद्ध, भगवान श्री कृष्ण, श्री वैंकटेश्वर, भगवान श्रीहरि विष्णु और तिरुपति बालाजी की मूर्तियां व अन्य सामान लोगों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।
फूला चंदू ने बताया कि उन्हें वुड कार्विंग कला उनके पिता से विरासत में मिली है। वे काफी समय से वुड कार्विंग यानी लकड़ी से मूर्तियां व अन्य सामान बनाने का काम कर रहे हैं। इस काम में बहुत मेहनत लगती है क्योंकि इसमें मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। बल्कि मूर्तियां और अन्य सामान हाथ से ही बनाया जाता है। इसमें काफी समय भी लग जाता है। क्योंकि पहले लकड़ी को काटा जाता है फिर सुखाया जाता है। हाथ से ही इन पर ड्राइंग की जाती है। फिर उसकी कटिंग करते हुए तराशा जाता है. तब जाकर ये खूबसूरत मूर्तियों का रूप लेती हैं। उन्होंने बताया कि वह अपने इस पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। वे सूरजकुंड मेला में विभिन्न देवी-देवताओं व अन्य प्रकार की 1 फीट से 6 फीट तक की लकड़ी की मूर्तियां लेकर आए हैं। दशरथ बताते हैं कि 6 फीट की एक प्रतिमा को बनाने में करीब 6 महीने का समय लगता है।








